सम्मान या रणनीति : भारत रत्न की बहस में उलझी बिहार-झारखंड की राजनीति

  • Post By Admin on Jan 27 2026
सम्मान या रणनीति : भारत रत्न की बहस में उलझी बिहार-झारखंड की राजनीति

पटना : बिहार और झारखंड की राजनीति में इन दिनों देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। यह चर्चा अब केवल सम्मान तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसके पीछे बड़े राजनीतिक संकेत और सत्ता समीकरण देखे जा रहे हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की घोषणा के बाद जिस तरह राजनीतिक घटनाक्रम बदले, उसने यह संकेत दे दिया कि अब यह सम्मान भी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है। उसी कड़ी में अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और झारखंड के वरिष्ठ नेता शिबू सोरेन के नाम चर्चा में हैं।

हाल ही में पटना स्थित जनता दल (यू) कार्यालय के बाहर नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग वाले होर्डिंग लगाए गए थे, जिन्हें मीडिया में खबर आते ही हटा लिया गया। इसके बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर नीतीश कुमार को समाजवादी राजनीति का अनमोल रत्न बताते हुए उन्हें भारत रत्न देने की मांग की।

पत्र सामने आते ही जदयू के कई नेताओं ने इससे दूरी बना ली और कहा कि यह व्यक्तिगत राय है, पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं है। राजनीतिक हलकों में इसे पार्टी की घबराहट और असुरक्षा के रूप में देखा जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भारत रत्न मिलना राजनीति से संन्यास लेने का संकेत माना जाना चाहिए। इतिहास बताता है कि ऐसा नहीं है। पंडित जवाहरलाल नेहरू को 1955 में भारत रत्न मिला था और वे अपनी मृत्यु तक प्रधानमंत्री बने रहे। सचिन तेंदुलकर और लता मंगेशकर जैसे उदाहरण भी यह दर्शाते हैं कि सम्मान मिलने के बाद कार्यक्षेत्र छोड़ा नहीं जाता।

उधर झारखंड में शिबू सोरेन को भारत रत्न देने की चर्चा को भी राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है। अटकलें हैं कि इसके बाद हेमंत सोरेन एनडीए के करीब जा सकते हैं और राज्य में नई राजनीतिक तस्वीर उभर सकती है। हालांकि यह केवल कयास हैं, लेकिन सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इसे लगातार हवा दी जा रही है।

विश्लेषकों के अनुसार, जदयू की चिंता का असली कारण बिहार विधानसभा का मौजूदा अंकगणित है। भाजपा अपने सहयोगियों के साथ बहुमत के करीब पहुंच रही है, जबकि नीतीश कुमार 85 सीटों के बावजूद पहले जैसी मजबूत स्थिति में नहीं माने जा रहे। यही वजह है कि जदयू नेता हर चर्चा में किसी साजिश की आशंका देखने लगे हैं।

कुल मिलाकर, भारत रत्न को लेकर चल रही बहस अब केवल सम्मान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिहार और झारखंड की बदलती राजनीति और सत्ता संतुलन का प्रतीक बनती जा रही है।

-अजित द्विवेदी