गया में पितृपक्ष का हुआ शुभारंभ

  • Post By Admin on Sep 20 2021
गया में पितृपक्ष का हुआ शुभारंभ

गया: बिहार के गया में देश-विदेश से हजारों की संख्या में पितरों को मोक्ष प्राप्ति और उनकी आत्मा की शांति को लेकर सनातन धर्मालंबी पहुंचे हैं।

सनातन धर्मालंबियों के बीच मोक्षधाम की सीढ़ी के रूप में विख्यात गयापाल पंडा पिंडदानियों को "सुफल" देते हैं।गयापाल पंडा महेश गुपुत,शिव कुमार भईय्या, मनीलाल बारिक, राजन सिजुआर, बच्चु लाल चौधरी, नारायण लाल गुर्दा सहित कई अन्य ने बताया कि ऐसी धारणा है कि पितृपक्ष जो एक पखवाड़े का होता है।

इस अवधि में "पितर"अपनी मोक्ष और आत्मा की शांति के लिए "गयाजी" में मौजूद रहकर अपने पुत्रों से जल तर्पण और पिंड दान की अपेक्षा रखते हैं।कई प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में गयाजी श्राद्ध और पिंडदान को लेकर उल्लेख है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार गया जी में भगवान श्रीराम और माता सीता द्वारा भी अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष प्राप्ति को लेकर पिंडदान और जल तर्पण करने का उल्लेख है।

कोरोना वायरस को लेकर पिछले दो सालों से गया में पिंडदान को लेकर प्रशासनिक बंदिश था।इस बार भी प्रशासन ने राज्य सरकार के निर्देश पर गया में पितृपक्ष मेला (राष्ट्रीय मेला) में झुंड या बड़े समूह में पिंडदानियों के आने पर रोक लगा दी है।

जिलाधिकारी अभिषेक सिंह ने बताया कि गया जी में पिंडदान करने के लिए आने वाले हर व्यक्ति का कोरोनावायरस जांच की जाएगी।जो पोजेटिव पाए जाएंगे। उन्हें दस दिन तक कोरेनटाइन कर दिया जाएगा।

जिला प्रशासन ने दूसरी ओर पिंडदानियों की सुविधा के लिए पुलिस, स्वास्थ्य और अन्य सुविधा को देखते हुए अतिरिक्त व्यवस्था की है।

पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए तीर्थयात्री गया में कर रहे पिंडदान

कोविड-19 के कारण काफी कम संख्या में जुटे हैं श्रद्धालु। सरकार द्वारा पितृपक्ष मेला को राष्ट्रीय मेला के रूप में नहीं मनाने का फैसला लिया गया है।लेकिन पिंडदान-तर्पण पर रोक नहीं है।

गयाजी में आज से यानी सोमवार से पितृपक्ष का आरंभ हो गया है। जिसके कारण देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु गया में श्राद्ध कर रहे हैं और फल्गु नदी में तर्पण कर रहे हैं। इस बार श्रद्धालुओं की संख्या काफी कम है।

हालांकि पिछले साल पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु ना के बराबर आए थे। क्योंकि उस समय पूर्णतया लॉक डाउन था। पितृपक्ष के शुभारंभ पर श्रद्धालु फल्गु नदी में बैठकर अपने पुरखों के आत्मा की शांति के लिए पूरे विधि-विधान के साथ पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं।

स्थानीय पंडा महेश गुपुत और सुजीत कुमार मिश्रा कहते हैं कि ऐसी मान्यता है और वेद पुराणों में अंकित भी है कि कभी भगवान श्रीराम अपने पिता राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए यहां पिंडदान किए थे। उनके साथ माता सीता और लक्ष्मण जी भी यहां पधारे थे।

धार्मिक मान्यता है कि गयाजी में फल्गु नदी में पिंडदान और तर्पण करने से पूर्वजों की आत्मा की शांति मिलती है और उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।

यूं तो यहां सालों भर पिंडदान और तर्पण होता है।लेकिन पितृपक्ष में इस धार्मिक अनुष्ठान का विशेष महत्व है। कहा यह भी जाता है कि जो श्रद्धालु यहां पिंडदान करने आते हैं, उनके पूर्वजों की आत्माएं पितृपक्ष के दौरान गयाजी तीर्थ में ही वास करते हैं। पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने और उनको याद करने का यह एक अनूठा धार्मिक परंपरा है।

त्रैपाक्षिक श्राद्ध पर कब और कहां किया जाएगा पिंडदान:

पहला दिन : फल्गु श्राद्ध

दूसरा दिन : ब्रह्मकुंड, प्रेतशिला, रामकुंड, रामशिला, कागबली

तीसरा दिन: उत्तरमानस, मोनार्क, दक्षिणमानस, सूर्यकुंड, जिहृा लोल वेदी

चौथा दिन : सरस्वती तर्पण, पंचर| धाम, मातड्गव्यापी, धर्मारण्य, बोधिदर्शन

पांचवा दिन : ब्रह्मसरोवर, कागबली, आम्रसेंचन

छठा दिन : विष्णुपद, रुद्रपद, ब्रह्मपद

सातवां दिन : कार्तिक, दक्षिणाग्नि, गार्हपस्य,

आठवां दिन: मतड्गपद, क्रॉच्छपद, इंद्रपद, अगस्त्य, कश्यप वेदी

नौवा दिन: रामगया, सीताकुंड, सौभाग्यपिटारी दान

दसवां दिन: गया सिर, गया कूप

ग्यारहवें दिन : मुंडपृष्टा, आदिगया, द्यौतपद (चांदी दान)

बारहवें दिन : भीमगया, गो प्रचार, गदालोल (स्वर्ण दान)

तेरहवें दिन: फल्गु दूध तर्पण, दीपदान (पितरों की दिवाली)

चौदहवें दिन : वैतरणी श्राद्ध, और अक्षयवट (श्राद्ध, शय्यादान)

पन्द्रहवें दिन : गायत्री घाट वेदी, आचार्य विदाई