सिंधिया ने मप्र के जनादेश को किया नीलाम- दिग्विजय सिंह

  • Post By Admin on Mar 24 2020
सिंधिया ने मप्र के जनादेश को किया नीलाम- दिग्विजय सिंह

भोपाल: मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मंगलवार को पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कटाक्ष करते हुए लिखा है कि सिंधिया मध्य प्रदेश के जनादेश को नीलाम कर गए। दिग्विजय सिंह ने यह पत्र सोशल मीडिया पर भी शेयर किया है। 

उन्होंने लिखा है कि पिछले दिनों ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस पार्टी छोड़ी और कांग्रेस की सरकार गिर गई। यह बेहद दुखद घटनाक्रम है जिसने न सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ताओं बल्कि उन सभी नागरिकों की आशाओं पर पानी फेर दिया, जो कांग्रेस की विचारधारा में यकीन रखते हैं। मुझे बेहद दुख है कि सिंधिया उस वक्त भाजपा में गए, जब वह खुलकर आरएसएस के असली एजेंडा को लागू करने के लिए देश को बांट रही है। कुछ लोग यह कह रहे हैं कि सिंधिया को कांग्रेस में उचित पद और सम्मान मिलने की संभावना समाप्त हो गई थी, इसलिए वह भाजपा में चले गए, लेकिन यह गलत है।

दिग्विजय सिंह ने पत्र में आगे लिखा कि कांग्रेस ने सिंधिया को 2013 में प्रदेश अध्यक्ष बनाने का ऑफर दिया था, लेकिन तब वे केन्द्र में मंत्री बने रहे। फिर 2018 में चुनाव जीतने के बाद उन्हें उपमुख्यमंत्री बनने का ऑफर दिया गया, लेकिन उन्होंने अपने समर्थक तुलसी सिलावट के नाम की पेशकश कर दी। कमलनाथ सिलावट को उपमुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार नहीं हुए और उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बना दिया। सिलावट न सिर्फ भाजपा में ऐसे वक्त में जब राज्य में कोरोना वायरस की महामारी से निपटने की प्राथमिक जिम्मेदारी स्वास्थ्य मंत्री के नाते उन्हीं की थी। सिंधिया ऐसे गैर जिम्मेदार व्यक्ति को उपमुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, जो कांग्रेस की विचारधारा के प्रति बेईमान निकला।

दिग्विजय सिंह ने पत्र में लिखा है कि सिंधिया के वैचारिक विश्वासघात को सम्माननीय बनाने के लिये सहानुभूति की आड़ लेने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि कमलनाथ और दिग्विजय ने पार्टी में उनका स्पेस छीन लिया था। इसीलिए पार्टी में वह घुटन महसूस कर रहे थे। यह आरोप निराधार हैं। ऐसा कहने वाले लोग पार्टी का इतिहास नहीं जानते हैं। वे भूलते हैं कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस हमेशा से मजबूत नेताओं की सामूहिक पार्टी रही है।

मेरे 10 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में अर्जुन सिंह, श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ला, शंकरदयाल शर्मा, माधवराव सिंधिया, मोतीलाल वोरा, कमलनाथ, श्रीनिवास तिवारी जैसे सम्मानित और बड़े जनाधार वाले नेता कांग्रेस पार्टी में थे। इन सभी को मेरी ओर से सदैव मान सम्मान मिला था। सभी मिलकर कांग्रेस को मजबूत भी करते थे। यही कारण है कि 1993 के बाद 1998 में कांग्रेस को दोबारा जनादेश मिला था।

उन्होंने आगे लिखा है कि घर को बचाने के लिए घर में आग लगा देना समझदारी नहीं। सिंधिया देश में कांग्रेस पार्टी के सर्वोच्च नेताओं में से थे। वह एआईसीसी के महामंत्री के पद पर नियुक्त हुए थे। वे भी प्रियंका गांधी के साथ उत्तरप्रदेश के प्रभारी बनाए गये थे। पार्टी से उन्हें बहुत कुछ मिला था। पार्टी को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम समझना कितना उचित है। 2003 में जब मेरे नेतृत्व में पार्टी मध्यप्रदेश में चुनाव हार गई थी, तब मैंने प्रण लिया था कि दस वर्ष तक मैं कोई सरकारी पद ग्रहण नहीं करूंगा। सिंधिया की तरह सत्ता का लोभ ही मेरी राजनीति का ध्येय होता, तो कांग्रेस के शासन वाले इन वर्षों में मैं सत्ता से दूर नहीं रहता, लेकिन राजनीति में जनसेवा का रास्ता हमेशा सत्ता की गली से नहीं गुजरता है।

दिग्विजय ने पत्र में आगे लिखा है कि मैंने 1971 में कांग्रेस पार्टी ज्वाइन की थी तो ये एक वैचारिक निर्णय था। राजमाता सिंधिया मुझे जनसंघ में ले जाना चाहती थी, लेकिन उस विचारधारा से मैं एकमत नहीं था और 1971 में मैं कांग्रेस में शामिल हो गया। स्वर्गीय माधव राव सिंधिया को कांग्रेस पार्टी में किसी प्रकार की शिकायत का कभी भी मौका नहीं दिया था। उनके दुखद निधन के पश्चात ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी में और गांधी परिवार में बहुत प्यार और सम्मान मिला। उनके क्षेत्र के सभी निर्णय उन्हीं की सहमति से होते थे। ये कहना गलत है कि पार्टी उन्हें राज्यसभा का टिकट नहीं देना चाहती थी, इसीलिये वे भाजपा में चले गए। जहां तक मेरी जानकारी है, किसी ने इसका विरोध नहीं किया था। कांग्रेस के पास दो राज्य सभा सीट जीतने के लिए जरूरी विधायक संख्या थी। इसलिए मुद्दा सिर्फ सीट का नहीं था। 

मुद्दा केंद्र सरकार में मंत्री पद का था, जो सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही दे सकते थे। मोदी-शाह की इस जोड़ी ने पिछले 6 साल में इसी धनबल और प्रलोभन के आधार पर उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, बिहार और कर्नाटक में सत्ता पर कब्जा किया है। 

मध्य प्रदेश के जनादेश की नीलामी सिंधिया स्वयं करने निकल पड़े, तो मोदी-शाह तो हाजिर थे ही, लेकिन अपने घर की नीलामी को सम्मान का सौदा नहीं कहा जाता।