प्रकृति और जीवन का है अटूट संबंध : डॉ. संजय पंकज

  • Post By Admin on Jun 07 2021
प्रकृति और जीवन का है अटूट संबंध : डॉ. संजय पंकज

मुजफ्फरपुर : 'प्रकृति की करुणा से ही संपूर्ण संसार और सारे प्राणी संरक्षित, संपोषित और विकसित होते हैं। सही अर्थ में प्रकृति ही विधाता की भूमिका में होती है। प्रकृति और जीवन का अटूट संबंध है जिस तरह से मां अपनी करुणा में समेटकर अपने शिशु को निहारती निहाल होती है उसी तरह प्रकृति भी अपनी संतानों को संरक्षित रखती है। महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की सृजनशीलता में प्रकृति अपने संपूर्ण विस्तृत रूप के साथ आकार लेती है। निराला निकेतन का प्राकृतिक वातावरण और उसमें काव्यदेवता के रूप में साधनारत आचार्यश्री करुणा को ही गाते रहे' - यह बातें ऑनलाइन आयोजित महावाणी स्मरण में बेला के संपादक कवि गीतकार डॉ. संजय पंकज ने कही।
विमर्श-विषय 'आचार्यश्री की कविता में प्रकृति और करुणा' पर विस्तार से बोलते हुए डॉ संजय पंकज ने आगे कहा कि आचार्य श्री का रचना-संसार प्रकृति और करुणा के केंद्र पर ही स्थित है। प्रकृति के बहुविध रूपों का लयात्मक आरोह-अवरोह उनकी कविताओं में है। शास्त्री जी मूलत:प्रकृति और करुणा के अमर गायक हैं। इसी के आलोक में सत्य और प्रेम के दर्शन समाविष्ट हैं। नदी, पहाड़, जंगल, झील, झरना, सागर, चांद, धरती, चिड़िया, फूल, अंबर, मेघ, वसंत बार-बार इनकी रचनाओं में आते हैं। अपनी प्रसिद्ध कविता मेघगीत के अंतिम चरण में आचार्यश्री अपनी करुण पुकार में बादल का आह्वान करते हैं - 'गिरि शिखर की उठा बाहुएं स्वर न अधर तक आता/आ रे आ तुझे बुला रही तेरी धरतीमाता। 'प्रकृति और करुणा को आत्मसात करके ही मनुष्य श्रेष्ठ बनता है।

मुख्य अतिथि जाने-माने कवि, गीतकार, उपन्यासकार, समीक्षक डॉ. महेंद्र मधुकर ने कहा- 'आचार्य शास्त्री जी की रचनाओं के तीन मुख्य पक्ष हैं- प्रकृति, मनुष्य और करुणा। विस्तार पाने की कला प्रकृति है। यही मनुष्य को करुणा का पाठ पढ़ाती है। अध्यक्षीय उद्गार में जयमंगल मिश्र ने कहा कि - शास्त्री जी का पूरा परिवेश और जीवन प्रकृति तथा करुणा के लिए ही समर्पित रहा। वे घंटों फूल-पौधों के सानिध्य में रहते थे और लगता था कि उससे वे बातचीत कर रहे हों। जमशेदपुर से कवि राजदेव सिन्हा ने अपने उद्गार में कहा कि आचार्य जी की करुणा मानवेतर प्राणियों के साथ ही सदा रही। सीतामढ़ी से विमल परिमल ने संस्मरण के माध्यम से बताया कि शास्त्री जी मृत्युपर्यंत प्रकृति और करुणा के बीच ही विचरते रहे। देहरादून से संस्कृत और हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान और कवि डॉ. रामविनय सिंह ने बताया कि आचार्य जी के संस्कृत काव्य में भी प्रकृति की निर्मलता के दर्शन होते हैं।

कवि समीक्षक डॉ. विजय शंकर मिश्र ने कहा- प्रकृति की उपासना आदिकाल से होती आ रही है। विशेषकर भारतीय संस्कृति और साहित्य में इसकी महिमा सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के कारण और अधिक बढ़ जाती है। आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री हिंदी के उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने 
मानवीय संवेदना और करुणा के विकास में पेड़-पौधों, वृक्षों, नदियों और पहाड़ों से आत्मीय संबंध को प्राथमिकता से स्वीकार किया। शास्त्री जी का प्रकृति प्रेम वह प्रेम है जो जीवन को संघर्ष के पथ पर चलना सिखाता है।

आयोजन में डॉ. शारदाचरण, डॉ. देवव्रत अकेला, ई. सत्यनारायण मिश्र, शुभनारायण शुभंकर, सत्येन्द्र कुमार सत्येन, रामवृक्ष चकपुरी, डॉ. शैल केजरीवाल, डॉ. कुमारी अनु, नर्मदेश्वर चौधरी, सहज कुमार, ललन कुमार ने काव्यपाठ कर वातावरण को आनंदमय बनाया। धन्यवाद ज्ञापन एचएल गुप्ता ने किया।