तुम एक बरगद सी लगती हो मुझे

  • Post By Admin on Mar 21 2022
 तुम एक बरगद सी लगती हो मुझे

मैं जब भी देखता हूँ तुम्हें
तुम एक बरगद सी लगती हो मुझे
जिसकी खुली हुई जुल्फें
हवा में बिखरी हो ऐसे
जैसे हो बरगद की लटें,
जिसे बार–बार, उछल–उछल कर
कोई नन्हा–सा अबोध बालक
छूना चाहता हो मेरी तरह।

मैं जब भी देखता हूँ तुम्हें
तुम एक बरगद सी लगती हो मुझे
जिसकी जड़ें निरंतर –
कुछ गहरी धँसती जाती हैं
मुझमें।
जिसकी छतनार छाँव
बनता हो मेरा आशियाँ
जिसमें सदियों –
ठहरने का ‘जी’ चाहे।

मैं जब भी देखता हूँ तुम्हें
तुम एक बरगद सी लगती हो मुझे
जिसमें दिखती है मुझे
प्रेम की अमरता,
उदित होता ज्ञान,
सृष्टि की सबसे प्राचीनतम पहचान -
प्रेम.....।
 
© संजय साव