काव्य पटल समाचार

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तुम एक बरगद सी लगती हो मुझे
  • Post by Admin on Mar 21 2022

मैं जब भी देखता हूँ तुम्हें तुम एक बरगद सी लगती हो मुझे जिसकी खुली हुई जुल्फें हवा में बिखरी हो ऐसे जैसे हो बरगद की लटें, जिसे बार–बार, उछल–उछल कर कोई नन्हा–सा अबोध बालक छूना चाहता हो मेरी तरह। मैं जब भी देखता हूँ तुम्हें तुम एक बरगद सी लगती हो मुझे जिसकी जड़ें निरंतर – कुछ गहरी धँसती जाती हैं मुझमें। जिसकी छतनार छाँव बनता हो मेरा आशियाँ   read more

शब्द
  • Post by Admin on Mar 21 2022

साक्षी रहे हैं कुछ शब्द, स्मृतियों का उपहारस्वरूप ! निरीक्षण के व्यथित आकाश में गुंजन कर रहे हैं कुछ शब्द! सीमाएँ बाँधता है क्षितिज पर यथातथ्य के कुछ शब्द ! दाँत निपोरते हैं ,पास आकर  हारे हुए -हँसते हुए, कुछ शब्द !  दो सुखों का एक सुख  लेकर आता है वैदर्भी के कुछ शब्द ! शब्दों की सभा में अधिक न्यून  वर्षों से ,उपेक्षित रहे कुछ शब्द !  रात में सुगबुग   read more

आदमी
  • Post by Admin on Mar 21 2022

बेचारे गधों को ये तक नहीं पता कि जो रहते हैं उनके आसपास उसमें भी कई हैं  उनके जैसे  उन बैलों को बताया नहीं किसी ने आदमी को भी कहा जाता है 'बैल' आदमी जो बन जाता है कभी 'गीदड़' ठुमक कर बनते हैं 'भीगी बिल्ली', या कोई 'शेर' जो होते हैं भीड़ में भेड़ ! असल में आदमी में होते हैं 'आस्तीन के साँप' भी समाज ने स्वीकारा है , आमजनों का हरकारा है आदमी घर की चौखट पा   read more

बचपन की डायरी
  • Post by Admin on Mar 21 2022

खोलता हूँ जब भी बचपन की डायरी याद आता है स्कूल के रास्ते ---- धूल धूसरित वह पगडंडी  आम का बगीचा उस बीच एक बड़ा सा ईमली का पेड़ जहाँ तुमने बिछाये थे अपने सपने की उड़ान और उन सभी सपनों का सहचर था मैं ! कुछ छोटे-छोटे, कुछ बड़े -बड़े से सपने पानी की एक बोतल थी, हम दोनों ने साथ पीया था तुम्हें भले न याद रहे ! पानी को सब याद था तुम्हारे होठों की छुअन और बचपन की सौगातें   read more